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रूस-यूक्रेन युद्ध का
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?

रूस-यूक्रेन की लड़ाई का गहरा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। यह ऐसे समय हो रहा है, जब कोविड महामारी के कारण विश्व की अर्थव्यवस्थाएं कीमतों को स्थिर करने और आपूर्ति शृंखला को फ़िर से स्थापित करने का प्रयास कर रही थीं, लेकिन यूक्रेन युद्ध ने उनके संभावित समाधनों को और अधिक कठिन बना दिया है। अन्य देशों के साथ भारत के लिए भी अमेरिका-यूरोप और रूस के बीच आर्थिक संतुलन को बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। यह युद्ध भले ही भारत से हजारों किमी दूर लड़ा जा रहा हो, परंतु उसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। यूक्रेन पर हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा आर्थिक प्रतिबंधें के साथ-साथ रूस के बैंकों पर स्विफ्रट पेमेंट सिस्टम का उपयोग करने पर रोक लगा दी गई है। यह भी भारत समेत अन्य देशों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।

रूस विश्व का लगभग 13 प्रतिशत पेट्रोलियम और 17 प्रतिशत प्राकृतिक गैस का उत्पादन करता है। प्रतिबंधें के कारण आपूर्ति बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती ही जा रही हैैं। भारत अपनी आवश्यकता का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतों के बढने से भारत को अब अधिक डालर का भुगतान करना पड़ेगा, जिससे डालर अधिक मजबूत और रुपया कमजोर होगा। रुपये के कमजोर होने से भारत के आयात महंगे हो जाएंगे, जिससे महंगाई बढ़ेगी। इस प्रकार की महंगाई को आयातित महंगाई कहते हैैं। भारत के चालू खाते का घाटा बढ़ जाएगा, जो भुगतान संतुलन को भी गड़बड़ा देगा। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में वृद्धि से और सब्सिडी के कम होने से राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा। कच्चे तेल और गैस के अलावा कुछ अन्य वस्तुएं भी महंगी हो जाएंगी। विमानन टरबाइन ईंध्नन की लागत 19 प्रतिशत बढने से विमान किराये में भी लगभग 30 से 35 प्रतिशत तक की वृद्धि होने के आसार हैैं।

सेमीकंडक्टर बनाने के लिए आवश्यक प्लेरियम का प्रमुख उत्पादक देश रूस और लियान का प्रमुख उत्पादक यूक्रेन है। प्लेरियम और लियान की आपूर्ति बाधित  होने से सेमीकंडक्टर या चिप भी महंगी हो जाएगी। परिणामस्वरूप स्मार्टफोन, लैपटाप, वाशिंग मशीन, माइक्रोवेव, फ्रिज, टीवी, कार, डिजिटल कैमरा आदि महंगे हो जाएंगे, जो सेमीकंडक्टर तकनीक पर निर्भर हैं। उल्लेखनीय है कि वाहनों की दृष्टि से भारत विश्व का पांचवां बड़ा बाजार है। आशंका है कि जीडीपी में 7.1 प्रतिशत योगदान करने वाला हमारा आटोमोबाइल सेक्टर प्रभावित होगा।

यूक्रेन और रूस वैश्विक स्तर पर गेहूं का 30 प्रतिशत, मक्का का 19 प्रतिशत और सूरजमुखी के तेल का 80 प्रतिशत निर्यात करते हैैं।युद्ध के कारण काला सागर बंदरगाह से होने वाली आपूर्ति बाधित होने से लगभग 80 अरब यूरो का व्यापार बाधित हो गया है। यूरोप के देशों में स्टील और इंजीनियरिंग, गेहूँ, मोटा अनाज, चाय, काफी और फल-सब्जियों समेत अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ गई है। भारत इन वस्तुओं के निर्यात को बढ़ाकर युद्ध से होने वाली हानि को कुछ कम कर सकता है।

साफ्रटवेयर क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान के कारण आज भारत का डिजिटल भुगतान पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है। इकोनोमिक इंटेलीजेंस यूनिट रिपोर्ट 2021 के अनुसार यूपीआइ (यूनाइटेड पेमेंट्स इंटरफेस) व्यवस्था ने आज भारत को वैश्विक स्तर पर एक लीडर की तरह खड़ा कर दिया है। भूटान, म्यांमार, सिंगापुर, यूएई, अफ्रीका आदि देश भारत की यूपीआइ व्यवस्था को स्वीकार कर रहे हैं। कुछ संशोधनों के साथ यूपीआइ व्यवस्था को भारत विश्व के समक्ष स्विफ्रट के एक नए विकल्प के रूप में रख सकता है। जब युद्ध की स्थिति बनती है, तब दुनिया विकास के बजाय हथियारों को खरीदने पर अधिक व्यय करने लगती है। ऐसी स्थिति में भारत को विश्व स्तर पर अपनी उपस्थिति इस प्रकार दर्ज करानी होगी, जिससे हमारी आर्थिक प्राथमिकताओं को और अधिक बल मिल सके।

 

 

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