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सदैव समझौतावादी रहें

कैसी भी स्थिति हो, कैसी भी परिस्थितियां हों यदि आप सबसे समझौता करके चलेंगे तो इन सब से आसानी से लड़ सकेंगे। सफलता के लिए लड़ना दूसरों के साथ समझौता करना जरूरी है।

सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि इस दुनिया में कोई भी अपनी गलती मानने के लिए आसानी से तैयार नहीं हो पाता है। हर व्यक्ति अपनी बात को अथवा अपने कार्य को ही सही मानकर चलता है। और इस प्रकार वह सबसे अधिक अपने-आप को ही छलता है। यदि कोई उसकी बात को अथवा उसके कार्य को गलत ठहरा दे तो उसे एकदम गुस्सा आ जाता है और वह व्यर्थ की बहस में उलझ जाता है। अपने आप को सही साबित करने के चक्कर में अपना कीमती समय, सद्भाव और ऊर्जा नष्ट कर देता है इसलिए व्यर्थ की बहस से बचें। गलती को गलती ही मानें। अपनी कार्यप्रणाली एवं व्यवहार में तद्नुसार सुधार करें तब शायद ही कोई आपसे असहमत होगा।

बहस किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती, बहस तो महज विलासिता होती है। बहस तो अहम पर टिकी होती है। हर बहस अहम के साथ शुरू होती है और पछतावे के साथ खत्म होती है। बहस में उलझा हर व्यक्ति अपने कथन को सही सिद्ध करने के लिए अपनी तमाम तार्किक शक्ति दाव पर लगा देता है। जब कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं होता तब बहस अनिर्णय के दौर में पहुंच जाती है। यदि आप किसी बहस को किसी निर्णय पर पहुंचाना चाहते हैं तो सामने वाले के उचित तर्कों को समुचित महत्व देते हुए सर्व सम्मति पर समाप्त कर दें। जब आप दूसरों के तर्कों को महत्व देंगे तो दूसरे भी आपके तर्कों का सम्मान करेंगे।

देखा जाये तो जिंदगी एक समझौता ही है। समझौते का नाम ही जिंदगी है। परिवार, समाज एवं संसार सब समझौते पर टिका है। आप कहीं भी रहें बगैर समझौते के आप जिंदा नहीं रह सकते। याद रखें जितनी जल्दी समझौते करते चलेंगे, उतने ही लाभ में रहेंगे।

जब हम खराब से खराब परिस्थितियों को स्वीकार कर लेते हैं। तब हमारे पास खोने को कुछ भी नहीं बचता किंतु पाने के लिए बहुत कुछ बचा रहता है। जब हम किसी अस्वीकृति को अंगीकार कर लेते हैं। तब उससे अधिक बुरा होने की संभावना समाप्त हो जाती है। जब किन्हीं परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति चुक जाये तो बेहतर है खुद को परिस्थिति के हवाले कर दें और परिस्थिति का समुचित आनंद उठायें।
यदि आप डर, चिंता, नफरत, स्वार्थ और दुनिया की हकीकत के साथ तालमेल बिठा पाने में नाकामयाब रहेंगे तो निश्चित रूप से आप टूटते चले जायेंगे। यदि आप इन सबके साथ आवश्यकतानुसार समझौते करते चलेंगे तो ये सभी नकारात्मक भूत अपने-आप छूटते चले जायेंगे इसलिए न पलायनवादी रहें, न भाग्यवादी रहें बस समझौतावादी रहें किंतु परिश्रम, कर्तव्यनिष्ठा एवं सकारात्मक सोच के साथ कभी समझौता न करें।

किसी बीमारी का या तो उपचार हो सकता है या नहीं हो सकता। हो सकता है तो तत्काल उचित उपचार लें। यदि नहीं हो सकता तो बीमारी से समझौता करें और बीमारी का भी आनंद उठायें। तब बहुत संभव है बीमारी खुद ही विदा हो जाये बशर्ते कि आप आशावादी रहें।

सही समय पर किया गया सही समझौता कई महायुद्धों को टाल सकता है। खुद के साथ किया गया सही समझौता हर हाल में आपको संभाल सकता है। समझौता किसी के साथ करें, समझौता तो वस्तुतः खुद के साथ ही करना पड़ता है। जो खुद के साथ समझौता नहीं कर सकता वो किसी के भी साथ समझौता नहीं कर सकता। सफलता का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र यही हो सकता है कि सब कुछ जानते हुए भी मूर्ख बने रहने का ढोंग करते रहो।

दृष्टांत

एक जेल में कैदियों को रोटियां गिनकर दी जाती थी। प्रत्येक कैदी को सुबह चार और शाम को तीन बड़ी रोटियां मिलती थीं। इस व्यवस्था में किसी को कोई शिकायत नहीं थी। एक दिन जेलर ने इस नियम में हल्का सा परिवर्तन कर दिया। कैदियों को सुबह तीन और शाम को चार रोटियां दी जाने लगी। दिन भर में दी जाने वाली रोटियां की संख्या वही थी फिर भी कैदियों ने विद्रोह कर दिया। अपनी आदत को यकायक बदल पाना कैदियों के लिए संभव नहीं था। जेलर ने समझौता करते हुए वापस पुरानी व्यवस्था लागू कर दी। पूर्व की भांति सुबह चार और शाम को तीन रोटियां मिलने लगी। इससे सबको बड़ी राहत मिली। इस समझौते से जेल प्रबंधन को खोना कुछ नहीं पड़ा, पाया बहुत कुछ। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि नयी व्यवस्था से कैदियों ने समझौता क्यों नहीं किया क्योंकि कैदी समझौतावादी नहीं थे। यदि कैदी समझौतावादी रहे होते तो जेल में ही क्यों आते इसलिए यदि जेल से बचना हो तो समझौतावादी तो होना ही पड़ेगा।

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