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हिसाब-किताब साफ सुथरा एवं अप-टू-डेट रखिए

* यह सही है कि जिन्दगी कोई गणित नहीं है किन्तु गणित के बिना भी हमारी गति नहीं है। यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है कि विद्यार्थी जीवन में आप गणित विषय में कैसे थे? महत्वपूर्ण तो यही है कि आप जिन्दगी के हिसाब-किताब में कैसे हैं। अक्सर गणित में होशियार रहने वाला व्यक्ति अपने दैनिक हिसाब-किताब में फेल हो जाता है।

* दैनिक जीवन में हमें एक-दूसरे के साथ विचारों, वस्तुओं एवं धन राशियों का आदान-प्रदान करना पड़ता है और इस आदान-प्रदान का लेखा-जोखा भी रखना पड़ता है। यह लेखा-जोखा जितना साफ सुथरा होगा, हमारा व्यवहार उतना ही विश्वास भरा होगा। प्रत्येक लेन-देन को तत्काल लिखने की आदत बना लें। यही आदत आपके लिए वरदान सिद्ध होगी।

* दैनिक आमद-खर्च,लेन-देन आदि का अंकन नियमित रूप से करते रहें। जिस आमद-खर्च का हिसाब किसी अन्य को न देना हो, तब भी उसका पूरा हिसाब रखें। अपनी याद-दाश्त पर अधिक भरोसा न करें। यदि समय पर हिसाब नहीं लिखा तो मौखिक रूप से याद रखने के लिए स्मृति पर भार बढ़ता चला जायेगा, तब स्मरण शक्ति का अत्यधिक अपव्यय होगा। हिसाब-किताब को बार-बार दोहराते रहने पर भी आप पूरी तरह याद नहीं रख पायेंगे और धीरे-धीरे स्मृति पटल से बहुत कुछ मिटता चला जायेगा। दूसरों की तो छोड़िए, तब खुद पर खुद का विश्वास भी उठता चला जायेगा इसलिए पेपर अथवा इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर लेन-देन, आमद-खर्च आदि की तत्काल प्रविष्टियां करते चलें।

* यदि आप दैनिक आय-व्यय की मदवार प्रविष्टियां करने की आदत बना लेंगे तो आपको एक साथ अनेक लाभ होंगे। अपनी स्मृति, चिन्तन-शक्ति और हर घड़ी का अन्य उपयोगी कार्यों में सदुपयोग कर सकेंगे। खर्चाें पर नियंत्रण रख सकेंगे। बचत के रास्ते खुलेंगे। भूल-चूक होने, क्रय शुदा वस्तु के खराब होने एवं भविष्य में खरीददारी करते समय दैनिक लेखे काफी मददगार साबित होते हैं।

* अपनी पारिवारिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों से सम्बन्धित सभी आवश्यक मदों की अलग-अलग पत्रावलियों, गतिविधियों को संचालित करते चलें और तत्सम्बन्धी पत्रादि को तत्काल संलग्न करते रहें।

* अगर आप रिकॉर्ड रखेंगे तो सभी विवादों से बचे रहेंगे और आवश्यकता पड़ने पर बिल, बाउचर, रसीद, अनुबन्ध पत्र, रजिस्टर्ड दस्तावेज, लीज-डीड, रेण्ट-डीड, जन्म व मृत्यु प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, उपचार एवं निदान स्लिप्स एवं रिपोर्ट्स, विद्युत जल, फोन, स्कूल फीस, लीज-मनी, गृहकर, आयकर, वाणिज्य कर, आदि के बिल, नोटिस एवं आर्थिक, सामाजिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों सम्बन्धी कागजात को अलग-अलग पत्रावलियों में सुरक्षित लगाते चलें। अधिक पत्रावलियां होने पर पत्रावलियों का विवरण एक पृथक् रजिस्टर में दर्ज करते रहें।

* नियमित हिसाब-किताब रखने पर दिमाग काफी हल्का रहेगा और आत्मविश्वास बढ़ेगा। लोगों का आप पर भरोसा बढ़ेगा। आमद-खर्च, लाभ-हानि, लेनदारी-देनदारी आदि का तत्काल पता लगाया जा सकेगा। भविष्य की योजनाओं के लिए अपेक्षित जानकारी उपलब्ध रहेगी। तब आप न खुद अंधेरे में रहेंगे, न दूसरों को अंधेरे में रखेंगे।

* अलग-अलग मदों के लिए आवश्यकतानुसार अलग-अलग लेजर/कैश बुक/स्टॉक रजिस्टर आदि संधारित करें और तत्सम्बन्धी प्रविष्टियां हाथों-हाथ करते रहें। बैलेंस आदि साथ-साथ अंकित करते चलें, ताकि लेजर आदि खोलते ही लेनदारी/देनदारी/बचत आदि का पता चल सके। इस तरह हिसाब-किताब साफ सुथरा रखते हुए आप अपनी विश्वसनीयता बनाये रख सकते हैं। याद रखें, आप सबको धोखा दे सकते हैं, किन्तु अपने-आप को धोखा नहीं दे पायेंगे। स्वयं को दिया जाने वाला धोखा सबसे खतरनाक होता है इसलिए सबके साथ-साथ स्वयं के प्रति भी उत्तरदायी बने रहें।

* यदि आपका समूचा हिसाब-किताब कम्प्यूटर पर हो, तब भी समय-समय पर प्रिंट आउट निकालते रहें और सम्बन्धित पत्रावलियों में लगाते रहें, ताकि कम्प्यूटर के खराब होने पर रिकॉर्ड उपलब्ध रह सके। जब भी किसी को बिल, लेजर आदि की प्रति दें, उसकी एक प्रति फाइल में अवश्य लगा लें। याद रखें, प्रिंट मीडिया का महत्व सदा से रहा है और आगे भी रहेगा, इसलिए इलेक्ट्रोनिक मीडिया से पेपर अवश्य तैयार करते रहें।

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