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अपना बजट मत बिगाड़िए

सरकारों, संस्थाओं एवं कम्पनियों की भांति हर व्यक्ति को भी अपना घरेलू एवं व्यवसाय सम्बन्धी बजट बनाकर ही आगे बढ़ना चाहिए और अपने बजट का सदैव ध्यान रखना चाहिए। सरकारों को तो मजबूरी में घाटे के बजट बनाने पड़ते हैं परन्तु किसी व्यक्ति के समक्ष ऐसी कोई मजबूरी नहीं हो सकती। इसलिए अपनी सम्भावित आय के अनुसार ही प्रस्तावित बजट तैयार करेें और अपनी वास्तविक आय के अनुसार उसे संशोधित करते चलें।

लाभ के लिए भले ही देर से सोंचे किन्तु खर्चों के लिए तत्काल सोंचे। खर्चों के साथ ही बचत की भी सोचें अर्थात् सोच-समझकर ही खर्च से पहले बचत करें। बचत के बिना बजट का कोई औचित्य नहीं है इसलिए जब भी बजट बनावें, बचत वाला ही बनावें।

यह सही है कि जो आय से अधिक खर्च करता है, उसके पास सिर्फ कर्ज बचता है। वस्तुतः कर्ज ही आदमी का सबसे बड़ा मर्ज होता है। कर्जदार होना ही गरीब होना है। गरीब होना बदनसीब होना है। बदनसीबी से बचने के लए बजट बनाकर चलिए और बजट के अनुसार ही अपने हाथ-पैर फैलाइए। तब आपको किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह सदैव याद रखें कि आपकी संभावित आय में यकायक वृद्धि संभव नहीं है। साथ ही आकस्मिक खर्चों का पूर्वानुमान भी संभव नहीं है इसलिए अपने बजट में बचत के पर्याप्त प्रावधान रखते चलें, ताकि आकस्मिक खर्चों से निपटा जा सके। जो अपनी आमदनी का कम से कम पच्चीस प्रतिशत तक बचा लेता है, वह बजट को ही नहीं, अपने जीवन को भी अपने पक्ष में कर लेता है अर्थात् बजट का अर्थ ही बचत है और बचत का आधार ही बजट है।

अपनी बचत को ऐसी बहुआयामी योजनाओं में निवेशित करें, जहां आयकर की बचत के साथ-साथ आकर्षक ब्याज/लाभांश/बोनस आदि प्राप्त हो सके। बचत पर अर्जित आय को इस प्रकार पुनः निवेशित करें कि भविष्य में एक बड़ी राशि प्राप्त हो सके। परिपक्वता पर प्राप्त राशि को किसी लाभप्रद योजना में पुनः निवेशित करते रहें अर्थात् जो भी बचत करें, लम्बे समय के लिए करें। यह भी मानकर चलें कि खर्चों की तुलना में कभी आय नहीं बढ़ेेगी इसलिए बचत करके ही अपनी आय बढ़ायी जा सकती है।

याद रखें, बचत में ही बचत है। बचत ही आमद है। बचत ही जिन्दगी को निश्चित व निरापद बनाती है इसलिए आवश्यक खर्चों को फिलहाल स्थगित रखें तो स्वतः ही बचत होती रहेगी। जो भी क्षण गुजरता है, कुछ न कुछ दायित्व सृजित करता है। बकौल मोहन, ‘आलोक सहेज, कुछ न कुछ सहेज, घड़ी जो आयेगी, मांगेगी दहेज।

यदि आप सम्पदा सृजित करते चलेंगे, तो सदा सुविधा सम्पन्न रहेंगे। यदि आप देनदारियां सृजित करते चलेंगे तो सदा दुविधा ग्रस्त रहेंगे। यदि आप बजट नहीं बनायेंगे अथवा बजट के अनुरूप नहीं चल पायेंगे तो मानकर चलें, देनदारियां ही सृजित करते चलेंगे। और तब आपकी सृजित सम्पदा भी बिक जायेगी और आप देनदारियों से कभी मुक्त भी नहीं हो पायेंगे।

धन कमाना उतना महत्वपूर्ण पूर्ण नहीं है, जितना धन का सदुपयोग करना है। उधार लेना और देना दोनों ही बुरी आदतें हैं इसलिए दोनों से ही बचकर रहें। याद रखें, उधार मांगने वाले के सामने एक बार नहीं कहने पर आप सौ बार नहीं सुनने से बच सकेंगे। उधार लेने का मतलब अपनी नींद गिरवी रखना है। उधार पर अंकुश रखने का एक मात्र उपाय है, अपने बजट पर नजर रखना।

ऐसी कोई योजना हाथ में न लें, जिसके लिए आवश्यक मार्जिन मनी भी उपलब्ध न हो। एक योजना पूरी होने पर ही दूसरी योजना हाथ में लें, अन्यथा आपका बजट गड़बड़ा जायेगा। आय और व्यय के बीच सन्तुलन बनाये रखें। बाजार में अपनी साख बनाये रखें। कर्ज लेने से पहले उसे चुकाने की योजना बनायें। कर्ज लेने से पहले, उस राशि के बिना गुजारा करने की आदत बनायें। जिस कार्य के लिए कर्ज लें, कर्ज को उसी मद में खर्च करें। जिस कार्य के लिए कर्ज दें, उस पर निगरानी रखें। अत्यधिक आवश्यक होने पर ही कर्ज लें, शौक के बतौर कर्ज न लें। कर्ज लेने को शौक न बनाये बल्कि कर्ज चुकाने को शौक बनायें।


बजट पर नियन्त्रण: आप उत्पादन, व्यापार, कृषि, सेवा, सलाहकार आदि किसी भी व्यवसाय में हों

  • (क) बजट बनाना और उस पर चलना आवश्यक है।
  • (ख) प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए अपना प्रस्तावित बजट तैयार करें। मदवार संभावित आय एवं व्यय को दर्शायें।
  • (ग) फिर दूसरे साल तक इस बात का प्रयास करते रहें कि आपकी आय प्रस्तावित आय से अधिक हो और खर्चा बजट प्रावधानों की तुलना में कम हों।
  • (घ) जिस मद में अनुमान से आय कम हो और व्यय अधिक हो, उस पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करें। ज्ञात कारणों एवं कठिनाइयों को दूर करें तथा अगले वर्ष के लिए अपने बजट में तद्दुसार बढ़ा-चढ़ाकर आय न दिखावें, तब ही बजट पर आपका पूर्ण नियन्त्रण रह सकेगा।
  • (ड.) आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक से अधिक आय प्राप्त करने के लगातार प्रयास करते रहें।
  • (च) छीजत पर नियंत्रण करें तथा उधार वसूली पर अधिक ध्यान केन्द्रित करें।
  • (छ) आय के नये-नये स्रोतों का सृजन भी करते रहें। किसी एक मद की आय से कभी सन्तुष्ट न हों। छोटी-छोटी आमदनी मिलकर ही बड़ी आमदनी का सृजन करती हैं।
  • (ज) खर्चों पर पूर्ण नियंत्रण रखें। जिसके बिना अभी काम चल सकता है, वह वस्तु न खरीदें। अधिक से अधिक बचत करें और बचत को अच्छे लाभ वाली योजनाओं में निवेशित करते चलें।

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