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अपनी ही नहीं, दूसरों की सफलताओं के लिए भी उत्साहित रहें

यह सदैव याद रखें कि आपकी सफलता अकेले आपके कारण नहीं है, उसमें प्रत्यक्षतः एवं परोक्षतः कई व्यक्तियों का योगदान होता है, क्योंकि सभी अपनी-अपनी सफलताओं के लिए कार्य करते हैं इसलिए सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति को यथोचित महत्व दें। उसके कार्य सम्बंधी जानकारी लेते रहें और समय-समय पर प्रोत्साहित करते रहें। कठोर परिश्रम के लिए सबसे बड़ा सम्बल प्रोत्साहन ही होता है।
अगर आपके पास प्रसन्नता है तो आप दूसरों को भी प्रसन्नता ही देंगे। अगर आपके पास खिन्नता है तो आप दूसरों को भी खिन्नता ही देंगे। जो आपके पास होगा, वही तो दे सकेंगे। जो आप देंगे, वही वापस ले सकेंगे। यदि आप उत्साह से भरे होंगे तो दूसरों को भी उत्साहित कर सकेंगे। मजा तो तब है, जब आप उत्साह को ब्याज सहित लौटाते रहें।

आप जब भी, जहां भी, जिससे भी मिलें, उत्साह के साथ मिलें पहले कुशलता पूछें, फिर काम की बात करें। सामने वाले को उसके कार्यों के लिए बधाई अवश्य दें। अपनी बजाय दूसरों की कामयाबी में अधिक उत्सुकता दिखायें। बिना पूछे अपने बारे में कुछ भी न बतायें। जब भी बतायें, संक्षेप में ही बतायें। जब आप दूसरों के लिए उत्साहित रहेंगे  तभी तो दूसरे भी आपके लिए उत्सुक रहेंगे।

जब आप दूसरों का भला चाहेंगे तो दूसरे भी आपका भला चाहेंगे। जब आप देना सीख जायेंगे, तब आपको मांगना नहीं पड़ेगा। तो देने के लिए उत्सुक रहें, लेने के लिए नहीं। आप दूसरों को क्या देंगे? वही तो देंगे, जो आपके पास होगा। क्या आप चाहेंगे कि दूसरे आपको बिल्कुल खाली समझेें? जब आप किसी की प्रशंसा नहीं कर सकते, जब आप किसी को प्रोत्साहित नहीं कर सकते, जब आप किसी का भला नहीं चाहते, तब आप बिल्कुल खाली समझे जायेंगे।

यदि आप अहंकार, अंध्कार घृणा, लालच और ईष्र्या जैसी नकारात्मक ऊर्जाओं से भरे होंगे, तब दूसरों को भी यही सब देंगे इसलिए कुछ देने से पहले अपने-आप को नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्त करें, सकारात्मक ऊर्जा से भरें। तब आप सदा उत्साहित रहेेंगे, आपसे मिलने वाले भी उत्साह से भर जायेंगे। सकारात्मक ऊर्जाओं के प्रकाश से अपने आभामण्डल को सदैव प्रकाशित एवं विकसित रखें ताकि संपर्क में आने वाला हर व्यक्ति स्वतः आप से ही प्रभावित हो उठे।

सफल व्यक्ति उदार होता है और अहसानमंद भी। सफल व्यक्ति सदा संवेदनशील होता है और भरोसेमंद भी। जो सफल होगा, उसे दूसरों की सफलताओं में भी अपनी ही सफलता के दर्शन होंगे। जो दूसरों की सफलताओं के लिए उत्सुक रहेगा, वही वस्तुतः सफल हो सकेगा।

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याद रखें, आपका नौकर भी आपकी परवाह तब तक ही करेगा, जब तक कि आप उसका ध्यान रखेंगे। जब आपके आस-पास के लोग सम्पन्न होंगे तब ही तो आप सम्पन्न हो पायेंगे। यदि आप व्यापारी हैं तो आपकी बिक्री तब ही बढ़ेगी, जब आपके ग्राहकों की क्रय शक्ति बढ़ेगी।

हमारे विचारों से ही हमारी संवेदनाएं जन्मती हैं। हमारी संवेदनशीलता से ही हमारी भावनाएं बनती हैं। हम अपनी भावनाओं के आधर पर ही दूसरों से व्यवहार कर पाते हैं इसलिए अपेक्षित होगा कि सर्वप्रथम हम अपनी खोज की पहचान प्राप्त करें और आगे बढ़ते रहें। दूसरों के साथ खुशियां बांटने से हमारी खुशियां दोगुनी हो जाती हैं।

आज के तकनीकी युग में तो एक-दूसरे पर हमारी निर्भरता अत्यधिक बढ़ चुकी है। हमारी सपफलता दूसरों की कुशलता, तत्परता और सहयोगात्मक प्रवृत्ति पर निर्भर करती है इसलिए हमें एक-दूसरे की कामयाबी की कामना करते रहना चाहिए। दूसरों की सफलताओं को अपनी सफलता के साथ जोड़कर देखना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरों की सफलाताएं सुनिश्चित होने पर ही हमारी सफलता सुनिश्चित हो सकती है।

दृष्टान्त

एक अति उत्साही व्यक्ति ने औद्योगिक क्षेत्रा के बीच अपना छोटा सा ढाबा चालू किया। जल्दी ही हर ग्राहक से आत्मीय संबंध् बना लिए। ढाबा चल निकला। वह हर ग्राहक से उसके धंधे के संबंध् में पूछने लगा और आवश्यक सलाह भी देने लगा। अक्सर पूछता-‘कहिए साहब’ मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? आपका काम कैसे चल रहा है? कहीं पैसा तो नहीं फंस रहा है? किससे बच कर रहना है? कौनसी पार्टी कैसी हैं? कौन-कौनसी सावधनियां रखनी है? बिजली कटौती का मुकाबला कैसे किया जा सकता है? श्रमिक क्या चाहते है? अर्थात् सबकी हर संभव सहायता करता। इस प्रकार ढाबे पर आने वाला हर ग्राहक ढाबे को अपना ही समझने लगा। तब उसे अपने ढाबे के बारे में सोचने की आवश्यकता ही नहीं रही। सबके सहयोग से ढाबा अपने-आप चलने लगा।

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