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सफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं है

जहां यह सही है कि सफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं है, वहीं यह भी सही है कि करोड़पति होने का मतलब सफल होना नहीं है अर्थात् व्यक्ति बिना करोड़पति हुए भी अपना जीवन सफलतम तरीके से व्यतीत कर सकता है और करोड़पति होते हुए भी सफलता से कोसों दूर रह सकता है।

सफलता को सम्पदा से नहीं, केवल प्रसन्नता से आंका जा सकता है। प्रसन्नता को किसी भौतिक सम्पदा से नहीं बल्कि आत्मिक सम्पदा से आंका जा सकता है। धनवान वही जो बिना धन जोड़े अपने सौ बरस पूरे करें। निर्धन वही जो सम्पन्न होते हुए भी कंजूसी में जीवन बसर करें।सफलता कोई अंक गणितीय इकाई नहीं है। सफलता के लिए अपेक्षित मुख्य मापदण्ड निम्न हो सकते हैं।

आर्थिक आत्मनिर्भरता, पारिवारिक प्रसन्नता, मानसिक, शारीरिक एवं आध्यात्मिक आरोग्यता, भविष्य के लिए निश्चितता, सामाजिक मान्यता

सफलता का मतलब है स्वयं की सुखद अभिव्यक्ति। दूसरों की स्वीकृति होना अपेक्षित नहीं है। जिन्दगी कभी फिसलती हुई न लगे, कभी पिछड़ती हुई न लगे, कभी भार न लगे, यही जिन्दगी का सार है। सम्मान के साथ जीने के लिए तो न्यूनतम संसाधनों की आवश्यकता होती है किन्तु न्यूनतम की भी कोई सीमा नहीं है। समय की गति एवं मानवीय विकास के साथ-साथ न्यूनतम में भी नये-नये साधन जुड़ते रहते हैं जो अपनी क्षमता के अनुरूप संसाधनों से समझौता कर लेता है, वही सफल कहलाता है।

असली प्रश्न यह है कि आखिर किसी व्यक्ति की आमदनी कितनी हो? आय की न्यूनतम सीमा तो निर्धारित की जा सकती है परन्तु अधिकतम कोई सीमा नहीं हो सकती। औसत के सिद्धान्त के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की वार्षिक आय प्रति व्यक्ति औसत आय से अधिक हो तो विशेष चिन्ता की बात नहीं होनी चाहिए। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि आप औसत पर अटक जायें या गरीबी रेखा से लटक जायेंसफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं हैसफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं है सफल होने का मतलब करोड़पति होना नहीं है। आपकी आय कम से कम औसत से दोगुनी तो होनी ही चाहिए, तब औसत का ग्राफ अपने आप ऊपर चढ़ने लगेगा। प्रति व्यक्ति औसत आय में अभिवृद्धि करते रहना ही आपकी सफलता का लक्ष्य होना चाहिए।

जिस प्रकार आप किसी दरिया से सीधे ही पानी पीकर अपनी प्यास संतुष्टि के साथ नहीं बुझा सकते, उसी प्रकार अपार सम्पदा के ढेर पर बैठ कर भी आप अपने जीवन को सदा सुखी नहीं बना सकते। उपलब्ध धन से आप जल्दी ही ऊब जायेंगे, उससे अधिक की योजनायें बनायेंगे और तब जो है, उसे भी पर्याप्त नहीं पायेंगे इसलिए जो है, उसका संतुष्टि के साथ उपभोग करें और अपनी आय बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहें।

वैसे धन की कोई अन्तिम सीमा नहीं हो सकती। जो करोड़पति है, वह अरबपति बनना चाहता है और जो अरबपति है, वह खरबपति बनना चाहता है। व्यक्ति की अपेक्षायें तो अनन्त होती हैं किन्तु आय के स्रोत सीमित ही होते हैं इसलिए अपेक्षायें कभी पूरी नहीं हो सकती। परन्तु याद रखें, सीमित अपेक्षायें सीमित आय से अवश्य पूरी हो सकती है।

कहा जाता है कि लक्ष्मी तो चलायमान है, चंचला है। आज है, कल नहीं। फिर जितना धन, उतनी उलझनेें, जिनका कोई हल नहीं है। जितना अधिक धन होगा, उतने ही अधिक दुश्मन होंगे इसलिए सफलता का मापदण्ड कभी बैंक बैलेन्स नहीं हो सकता। सफलता का मापदण्ड किसी का चैलेन्ज स्वीकार करना नहीं हो सकता। सफलता तो एक मनोवैज्ञानिक अवस्था है जो व्यक्ति के सोच पर निर्भर करती है और सोच भी सबकी एक सी नहीं हो सकती।

समय-समय पर गरीबी-अमीरी की परिभाषायें बदलती रहती हैं। आज तो जिसके पास जितना अधिक स्थान होगा, वह उतना ही अधिक धनवान होगा। वैसे भी स्थान आरम्भ से ही सफलता का एक शाश्वत मापदण्ड रहा है और आगे भी रहेगा। हर व्यक्ति खुले में श्वास लेना चाहता है। दूसरों से जरा दूर रहना चाहता है और इसके लिए उसे अपने आस-पास अधिक स्थान की आवश्यकता होती है अर्थात स्थान में अपेक्षित अभिवृद्धि ही सफलता के लिए आवश्यक होती है।

सफलता का मापदण्ड

वैसे तो सफलता के मापदण्ड समय-समय पर एवं व्यक्ति दर व्यक्ति बदलते रहते हैं।

(क) किसी ने कहा है कि अपनी श्रेणी के लोगों के बीच अपनी योग्ता को सिद्ध करना ही सफलता है।

(ख) कोई कहता है कि धन के बल पर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने की शक्ति रखने वाला ही सफल कहलाता है।

(ग) आध्यात्मिक विद्वानों का कहना है कि जो सांसारिक वस्तुओं के ऊपर उठकर सोचता है, वही सफल है।

(घ) किन्तु असली सफलता किसे माना जाये? सफलता तो वस्तुतः एक तुलनात्मक स्थिति है। जिससे आप तुलना करते हैं, आपकी सफलता उसी पर निर्भर करती है।

(ड) आपके पास कितनी सम्पदा है? यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण तो यही है कि आपकी नियमित एवं निश्चित आमदनी कितनी है। और आप उस आमदनी का कितना सदुपयोग करते हैं यही सफलता है।

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